न जाने क्या हो गया है इन सब को ?
ये देश किसी समय लोकतांत्रिक देश के रुप में जाना जाता था, लेकिन आज के जो हालात यहां बन रखे हैं उन्हें देखकर नहीं लगता कि यहां के नेता लोग लोकतंत्र को महत्ता दे रहे हैं ...!
न तो यहां सरकार (पक्ष) को विकास से कोई मतलब है और न ही विपक्ष को विकास से कोई मतलब है बस सभी अपनी ही बहसबाजी में लगे हुए हैं ... यहां इनका फर्ज़ ये था कि वो देश के विकास के नाम पे वोट मांगे पर यहां कोई धर्म के नाम पे तो कोई जाति के नाम पर वोट मांग रहे है ।
मैं देख रहा हूं इन कई वर्षों से तो एक बात देखने को मिली है कि नेता धर्म के नाम पर और जाति के नाम पर वोट मांग रहे है और जनता भी उन्हीं को जिताकर भेजती है इसका ये तो अर्थ निकलता है कि जनता को भी विकास से कोई लेना देना नहीं है । मेरा किसी विशेष दल से संबंध नहीं है और न ही मैं किसी का सपोर्टर हूं ।
अटल बिहारी वाजपेई जी ने कुछ पंक्तियां कही थी -
"सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर इस देश का लोकतंत्र तथा ये देश रहना चाहिए।"
लेकिन लगता नहीं कि लोकतंत्र है ! यदि यहां बहुमत से सरकार बन जाए तो सरकार अपनी मर्जी के अनुसार नियम बना देती है और चाहती है कि एकाधिकार करने की कोशिश करती है और यदि पूरी पूरी सरकार बने तो दोनों पक्ष विकास के नाम पर नहीं बल्कि कोई और ही मुद्दो पर बहस करने लग जाते है । और जो विकास आज दिखाई दे रहा है वो भी बच नहीं पा रहा है ! वो चाहे कई एयरपोर्ट्स देख लो कई सेतु देख लो ।
यार पत्ता नहीं क्यों हमारे गांवो के कई सालों पुरानी इमारतों का भी यह हाल तो नहीं है और उन इमारतों में, इन सरकारों ने सार्वजनिक कोई निर्माण कार्य में लगाया है उतना पैसा भी शायद नहीं लगा होगा तो फिर इनका ये हाल क्यों हैं ? आखिर क्यों ?
नेता कहते है कि आप हमें जिताएं वर्ना हमारा धर्म संकट में पड़ जायेगा लेकिन "धर्म कभी संकट में था ही नहीं, संकट में तो केवल कुर्सी रहती है, केवल कुर्सी !"
मीडिया ! कहां गया मीडिया ! लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, आखिर कहां गया !
मीडिया का काम क्या होता है ? यही ना की जनता की कोई भी आवाज हो जो सरकार तक पहुंचाऐं लेकिन वर्तमान में इसका बिल्कुल विपरीत हो रहा है जनता की कोई भी आवाज मीडिया नहीं उठा रहा वह सिर्फ सरकार की या कुछ नेताओं, उन्हीं की बातें करता रहता है हर वक्त चाहे वह अखबार हो, टीवी हो, किसी भी प्रकार से हो बस किसी न किसी सरकार की या किसी न किसी नेता की किसी न किसी धर्म पर या किसी न किसी जाति पर ...
पत्रकार के पास कोई आवाज़ लेकर जाए तो वो कहता है इतने पैसे लगेंगे ! वा रे वा मीडिया !
- शिव रतन खीचड़ (Co-Founder Of EduKrishna)







